गोपाष्टमी

गोपाष्टमी के दिन भगवान श्री कृष्ण गौवों की सेवा करनेलगेजबकि इसके पर्वू र्ववेबछड़ेचरातेथे। गोपाष्टमी कृष्ण भक्तों द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की इसी लीला का गणु गान करनेके लि ए मनाई जाती है।

गोपाष्टमी कब मनाई जाती है?

गोपाष्टमी कार्तिक मास की शुक्लाष्टमी को मनाई जाती है।

गोपाष्टमी क्यों मनाई जाती है?

गोपाष्टमी के दिन भगवान श्री कृष्ण गौवों की सेवा करने लगे जबकि इसके पूर्व वे बछड़े चराते थे। गोपाष्टमी कृष्ण भक्तों द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की इसी लीला का गुणगान करने के लिए मनाई जाती है।

गोपाष्टमी से सम्बंधित लीला

जब कृष्ण का आध्यात्मिक शरीर, आयु तथा बल में कुछ बढ़ा हुआ दिखने लगा, तब नन्द महाराज समेत वृन्दावन के गुरुजनों ने कृष्ण को बछड़े चराने वाले से बढ़ाकर नियमित गोपालक के पद पर प्रोन्नत करने का निश्चय किया। अब कृष्ण प्रौढ़ गौवों, साँड़ों तथा बैलों की रखवाली किया करते थे। इसके पूर्व नन्द महाराज स्नेहवश कृष्ण को नन्हा जानकर तथा गाय-बैलों की रखवाली करने में अक्षम मानते रहे।

गोपाष्टमी का महत्व

गोपाष्टमी का उत्सव गायों की रक्षा का प्रतीक है। भगवान श्री कृष्ण ने अपनी लीलाओं के द्वारा सभी के समक्ष गोरक्षा का आदर्श स्थापित किया है। गोपालक श्रीकृष्ण ने गोपाष्टमी, गोवर्धनपूजा आदि अवसरों पर गोपूजन किया है।

गोपाष्टमी से संबंधित शास्त्रीय संदर्भ - 1

पद्मपुराण के कार्तिक माहात्म्य अनुभाग में कहा गया है

शुक्लाष्टमी कार्तिक तु स्मृता गोपाष्टमी बुधै।
तद्दीनाद् वासुदेवोऽभूद् गोपः पूर्वं तु वत्सपः ॥

"विद्वान लोग कार्तिक मास की शुक्लाष्टमी को गोपाष्टमी के नाम से जानते हैं। उसी दिन से भगवान वासुदेव गौवों की सेवा करने लगे जबकि इसके पूर्व वे बछड़े चराते थे।"

गोपाष्टमी से संबंधित शास्त्रीय संदर्भ - 2

श्रीशुक उवाच
ततश्च पौगण्डवयः श्रीतौ वृजे बभुवतुस्तौ पशुपालसम्मतौ।
गश्चरायन्तौ सखिभिः समं पदै-वृन्दावनं पुण्यमतीव चक्रतुः ॥

वृन्दावन में रहते हुए जब बलराम तथा कृष्ण ने पौगण्ड अवस्था ( ६-१० वर्ष) प्राप्त कर ली तो ग्वालों ने उन्हें गौवें चराने के कार्य की अनुमति प्रदान कर दी। इस तरह अपने मित्रों के साथ इन दोनों बालकों ने वृन्दावन को अपने चरणकमलों के चिन्हों से अत्यंत पावन बना दिया। - श्रीमद्भागवतम् 10.15.1

कृष्ण गोधन के रक्षक हैं

यमुना जल में कालिय नाग का मान-मर्दन करके श्री कृष्ण ने कहा- "हे नागराज ! यद्यपि मैंने आपको कष्ट पहुँचाया है, फिर भी मुझमें दोष-दृष्टि न करें । देवताओं के लिए भी आराध्य गोधन की रक्षा मेरा कर्तव्य है। आपकी उपस्थिति से गायों की रक्षा के लिए ही मैं आपको यहाँ से निष्कासित कर रहा है।"

कालिय के निवास के कारण यमुनाजल विष से दूषित हो गया था । उसे पीकर कितनी ही गायें कालकवलित हो गई थीं। अतः श्री कृष्ण ने जल में प्रवेश किया और कालिय का शासन करके उसे वहाँ से अन्यत्र चले जाने का आदेश दिया ।

इस अवसर पर श्री कृष्ण ने गोधन को देवों के लिए भी आराध्य कहा और साथ में गोरक्षा का आदर्श भी स्थापित किया ।

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