हमारे दीक्षा गुरु

कृष्ण कृपामूर्ति श्री श्रीमद् अभय चरणारविन्द भक्तिवेदांत स्वामी ठाकुर श्रील प्रभुपाद

1 सितंबर वर्ष 1896 को कोलकाता शहर के एक सामान्य परिवार में बालक अभय चरण का जन्म हुआ । हालांकि परिवार धार्मिक प्रवृत्ति का था, किंतु यह निश्चित रूप से परिवार के लिए कल्पनातीत था कि एक दिन यही बालक सारे विश्व को कृष्ण भक्ति से भावना भावित कर मानवता को भक्ति के मार्ग पर पुनः प्रेरित करेगा । सन 1922 में गौड़ीय मठ के संस्थापक श्री श्रीमद् भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर से भेंट के पश्चात अभय चरण के जीवन को मानो एक नयी दिशा मिल गई जिन्होंने अभय से वैदिक ज्ञान को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से पाश्चात्य देशों में प्रचार करने का निवेदन किया ।

वर्ष 1935 में इलाहाबाद में औपचारिक दीक्षा लेने के पश्चात तो अभय ने वैदिक ज्ञान के इस सार को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया कि वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ भौतिक जीवन के समस्त दु:खों जैसे जन्म, मृत्यु, जरा, तथा व्याधि से पूर्णतः मुक्ति है । यह स्थिति प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा उसकी भगवान् श्री कृष्ण के प्रति भक्ति और कृष्ण प्रेम को पुनः जागृत कर स्थाई रूप से प्राप्त की जा सकती है ।

वर्ष 1944 में उन्होंने "बैक टू गॉडहेड" नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया जिसका प्रकाशन एवं वितरण आज तक अनवरत जारी है । आगामी कुछ वर्षों में उन्होंने अभय चरणारविंद नाम से भगवद् गीता पर एक टीका भी लिखी जो कि आज विश्व में भगवद् गीता की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली टीका अथवा व्याख्या है । गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय द्वारा वर्ष 1947 में श्री श्रीमद् अभय चरणारविंद को उनके दार्शनिक ज्ञान एवं भक्ति की प्रतिभा के कारण "भक्तिवेदांत" की उपाधि से सम्मानित किया गया । वैवाहिक जीवन से सन्यास के उपरांत उन्होंने वृंदावन की यात्रा की और वहीं पर श्री श्री राधा दामोदर मंदिर के विनम्र परिवेश में निवास किया, जीवन क्रम से सन्यास लेने के पश्चात वर्ष 1959 में उन्होंने ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी के नाम से सनातन धर्म के एक अति महत्वपूर्ण ग्रंथ श्रीमद् भागवतम् के 18000 श्लोकों के बहु खंडीय अनुवाद और टीका व्याख्या का कार्य आरंभ किया ।

जीवन के उत्तरार्ध के वर्षों में जब कोई सामान्य व्यक्ति जीवनचर्या से अवकाश लेकर विश्राम का विचार करता है, तब ऐसी 69 वर्ष की अवस्था में वर्ष 1965 में उन्होंने पश्चिमी देश अमेरिका जाकर अपने आध्यात्मिक गुरु के स्वप्न को साकार किया । वे भगवान चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाओं को पाश्चात्य देशों में ले गए और जनसामान्य को भी हरे कृष्ण महामंत्र की महिमा से परिचित करवाया ।

उनके अनुयाई उन्हें प्रेमवश "प्रभुपाद" कहते थे प्रभुपाद ने संप्रदाय स्तर से परे जाकर यह सिखाया कि प्रत्येक प्राणी भगवान श्रीकृष्ण का नित्य दास है जिसमें भगवान् श्री कृष्ण के प्रति शुद्ध प्रेम के आनंद की अनुभूति करने की एक सहज प्रवृत्ति भी है, जो कि सुषुप्तावस्था में है । वर्ष 1977 में संसार से प्रयाण के पूर्व तक उन्होंने 70 से अधिक प्रामाणिक अनुवाद तथा टीकाएँ (व्याख्याएं) पूर्ण कर ली थीं, जिसमें श्रीमद् भागवतम्, श्रीमद् भगवद् गीता. श्री चैतन्य चरितामृत तथा कई अन्य उपनिषद् भी सम्मिलित हैं । ये सभी कृतियां विद्वतजनों के समाज में उनकी प्रामाणिकता, गूढ़ता तथा स्पष्टता के चलते अत्यंत सम्माननीय हैं ।

श्रील प्रभुपाद के कार्य को विश्व के लगभग सभी मुख्य भाषाओं  में अनुवादित किया गया तथा इन्हें महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम की मानक पुस्तकों के रूप में भी सम्माननीय स्थान प्राप्त हुआ । श्रील प्रभुपाद ने भारत की संस्कृति तथा धार्मिक उत्सवों जैसे रथ-यात्रा को पाश्चात्य देशों तक पहुंचा दिया । आध्यात्मिक क्रांतिकारी के रूप में श्रील प्रभुपाद की प्रतिष्ठा लगातार बनी हुई है जिसने लाखों-करोड़ों मनुष्यों के चित्तों पर कृष्ण-प्रेम का प्रभाव उत्पन्न कर दिया । श्री श्रीमद् ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी ठाकुर श्रील प्रभुपाद भारत के सर्वोपरि तथा अग्रगण्य अध्यात्मिक राजदूत के रूप में माने जाते हैं ।  यह सब उनके आध्यामिक समर्पण तथा अभूतपूर्व उपलब्धियों का परिणाम था कि भारत की सांस्कृतिक प्रचुरता को पाश्चात्य देशों में पहचान प्राप्त हुई तथा जिसे आज भी सम्पूर्ण विश्वभर में अपनाया जा रहा है ।


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